आरक्षण का शासकीय आदेश
पेरियार रामास्वामी का भाषण, आरक्षण का शासकीय आदेश
सर्वपक्षीय सार्वजनिक सभा, दि.13/08/1950
अध्यक्ष महोदय, सम्माननीय भाइयों बहनों और मेरे प्रिय काॅम्रेड्स!
जाति आधारित आरक्षण के संबंध में निकाला गया जाति विषयक शासकीय आदेश (Communal G.O.) रद्द करने के लिए समाज के एक विशिष्ट घटक ने प्रयत्न की पराकाष्ठा की है यह बात आप सब जानते ही हैं।
कल "संपूर्ण बंद" की मैंने जाहिर घोषणा की है, विद्यालयीन और महाविद्यालयीन विद्यार्थियों से भी मैंने बंद में शामिल होने का आह्वान किया है, व्यापारियों और उद्योगपतियों को भी कल अपनी अपनी दुकानें बंद रखने का आह्वान किया है।
कल निकलने वाले भव्य मोर्चे में शामिल होकर जनता से जाति विषयक शासकीय आदेश के प्रति अपनी भावना शासन को दिखा देने का भी आह्वान किया है।
इस आह्वान के कारण कुछ लोगों ने मुझ पर टिप्पणी भी की है, मैंने गलत कदम उठाए हैं कुछ लोगों ने ऐसा भी कहा है, कुछ लोगों ने तो मुझ पर यह भी आरोप लगाया है कि आंदोलन करके मैं उनके लिए संकट का निर्माण कर रहा हूं। कुछ मंत्री भी इसी तरह का आरोप लगा रहे हैं,मेरा यह आंदोलन राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है ऐसा अर्थ भी कुछ कांग्रेसी मंडली लगा रही है, उनके जो भी समझ में आ रहा है लिख रहे हैं, उन्हें जो करना है करने दो मुझे उसकी चिंता नहीं है।
आप सभी से मेरी यही विनती है कि केवल मैं कह रहा हूं इसलिए मेरी बात मत मानिए और जैसा भी मैं कह रहा हूं या कोई और कहे आप लोग वैसा व्यवहार मत कीजिए, आंख बंद करके आप किसी पर भी विश्वास मत कीजिए, आप उस पर विचार करिए,सत्य को खोज निकालिए, आप विवेकशील हो आप में अपनी बुद्धि विवेक से विचार करने की क्षमता है हर तरह से जांचिए परखिए, भला बुरा , सही गलत का तथ्यों के आधार पर गहराई से विचार करिए फिर निर्णय लीजिए।
मैं जो कुछ भी कहता हूं उसमें कुछ तथ्य हो , उसमें न्याय और सत्य हो, ऐसा यदि आपको लगता है तो आपकी बुद्धि विवेक को जो उचित लगता है वह करिए।
जाति-आधारित आरक्षण यह कोई नया नया चर्चा में आया विषय नहीं है सन् 1900 से यह विषय चल रहा है सभी जातियों को न्याय दिलाने के लिए शिक्षा और नौकरियों में उनको उनका हिस्सा मिलना चाहिए इसके लिए हमारे समाज के नेतृत्व कर्ता, अपनी वरिष्ठ मंडली और जागरूक जनता ने इस जाति-आधारित आरक्षण की मांग बहुत पहले से की हुई है। उसके लिए उन्होंने जनसंख्या और उसमें प्रत्येक जातियों की संख्या को आधार बनाया था।
इसमें एक बात आपके ध्यान में आयेगी कि यह मांग जिन जिन लोगों ने किया वे कांग्रेस में बहुत कम समय के लिए रहे।
दूसरे शब्दों में कहें तो जाति आधारित आरक्षण के महत्व को समझने तक कांग्रेस में रहे।
सभी जातियों को समान न्याय नहीं मिल रहा है यह जिसके भी ध्यान में आया उसने ताबड़तोड़ कांग्रेस छोड़ दिया।
कांग्रेस एक विशिष्ट जाति के कल्याण और प्रगति के लिए कार्यरत है यह स्पष्ट हो चुका है।
कांग्रेस नाम का घर व्यवस्थित रूप से खड़ा करने में जो असफल हुए उन्होंने भी बाद में माना कि कांग्रेस पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति की सतत विरोधी है यह स्पष्ट किया।
शांति,प्रगति और सुव्यवस्था से वंचित पिछड़े और अनुसूचित वर्ग के उत्थान के लिए वे लोग ही आगे आए और सामाजिक न्याय के लिए उन्होंने आवाज बुलंद किया , लोगों में भी अपने आधिकारों के प्रति तेजी से जागरूकता बढ़ने लगी।
उत्तर भारत में भी सन् 1900 के साल में यही मांग जोरदार तरीके से हुई थी, जनसंख्या के अनुसार प्रत्येक क्षेत्र में जाति के आधार पर आरक्षण दिया जाय ऐसा दो टूक कह दिया गया था।
जाति आधारित आरक्षण का श्रेय सर्वप्रथम मुसलमानों को देना चाहिए,इस लड़ाई का नेतृत्व सर्वप्रथम उन्होंने ही किया।आप लोगों में से बहुतों को इतिहास की यह महत्वपूर्ण जानकारी न होने की संभावना है, परन्तु कुछ बुजुर्गों को इसकी वास्तविकता मालूम है,आप लोगों में से भी कई लोगों को इसकी सत्यता की जानकारी है । जाति आधारित आरक्षण की मुस्लिमों की मांग के क्रियान्वयन का कांग्रेस ने तीव्र विरोध किया,उनकी आवाज को कांग्रेस ने दबा डाला, परन्तु आगे चलकर कांग्रेस को इस विषय में हार स्वीकार करनी पड़ी और उस समय ब्रिटिश शासन ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की योजना लाया।
सन् 1900 में ही ब्रिटिशों ने जाति आधारित आरक्षण की आवश्यकता को मान्य किया और सभी जाति जमाति को न्याय देने के लिए वे आगे आये,जाति आधारित आरक्षण ही एकमात्र विकल्प सभी जातियों के कल्याण के लिए हो सकता है इस सच्चाई को उन्होंने स्वीकार किया।
उस समय भारत की राजधानी कलकत्ता होने के कारण और कलकत्ता में बहुसंख्यक निवासी मुस्लिम होने के कारण उन्हें आसानी से सफलता भी मिल गई।
ब्रिटिश शासन पर कांग्रेस का कोई असर नहीं पड़ सका।
अंततः पृथक निर्वाचन क्षेत्र पाने में मुस्लिम किसी तरह कामयाब हो गये।
ब्रिटिश शासन ने सभी क्षेत्रों में जाति आधारित आरक्षण के लिए सहमति दिखाई।
बाद में कांग्रेस ने स्वदेशी आंदोलन शुरू किया इस आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य मुस्लिमों को मिले पृथक निर्वाचन क्षेत्र और बंगाल विभाजन का तीव्र विरोध करना ही था परन्तु भोली भाली जनता ने उन पर विश्वास किया उन्हें स्वदेशी आंदोलन से बड़ी अपेक्षाएं थीं इस आंदोलन के विषय में पूर्णतः अज्ञान होने के कारण स्वदेशी आंदोलन से वे किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे ,वे इसी का रास्ता देख रहे थे मुस्लिमों को मिला हुआ कानूनन अधिकार नकारना यह किसी भी तरह से योग्य नहीं है इसकी जानकारी उन्हें हुई ही नहीं,इस प्रकार के अज्ञान से क्या हासिल होता है?
आज भी अनेक लोगों में राजनीति की मूलभूत तत्व के बारे में प्रचंड अज्ञान दिखाई देता है।
सर्वसामान्य नागरिक नेतृत्वकर्ता और अन्य लोग जो कहते हैं उसपर पूर्ण रूप से विश्वास करते हैं हकीकत जानने जितना जागरूक वे अभी तक भी नहीं हुए हैं यही दिखाई पड़ता है।स्वदेशी आंदोलन देशभक्ति का आंदोलन है ऐसा ही अंधविश्वास उन्हें लगता है यह अत्यंत बुरी अवस्था है।
परंतु मुस्लिम समाज के संगठन फौलादी हैं, उन्होंने कांग्रेस के विरोध का मजबूती से मुकाबला किया और अपना हक सुरक्षित रखा।
1910 में भी मुस्लिम और हिन्दू के लिए अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र का विभाजन किया गया था बाद में कुछ समस्या पैदा हुई इस आधार पर निर्वाचन क्षेत्र का निर्माण करना साहस का काम था फिर भी कुछ निर्वाचन क्षेत्र मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र तो कुछ मुसस्लिमेत्तर निर्वाचन क्षेत्र के रूप में विभाजन किया गया।
मुस्लिम विरोधी कांग्रेस इसमें असफल सिद्ध हुई किन्तु वह इस असफलता को मान्य करने को तैयार नहीं थी । ऐसा होने के बावजूद कांग्रेस के पास शरणागत होने के अतिरिक्त दूसरा विकल्प नहीं था अंततः ब्रिटिश सरकार बंगाल का विभाजन न करे इस शर्त पर पृथक निर्वाचन क्षेत्र मान्य किया,इस प्रकार मुस्लिम समाज ने अनेक अड़चनों को पार करते हुए 1910 में पृथक निर्वाचन क्षेत्र की लड़ाई किसी तरह जीता।
इसके बाद भी कांग्रेस ने अपना मुस्लिम विरोधी एजेंडा चालू रखा परंतु इसी के फलस्वरूप मुस्लिमों के संगठन और मजबूत होकर मुस्लिम लीग के रूप में एक शक्तिशाली व कांग्रेस विरोधी पार्टी कम समय में ही उभरकर सामने आई। कांग्रेस के प्रत्येक हमले के प्रतिकार करने की क्षमता मुस्लिम लीग में थी। कांग्रेस के लीग विरोधी सारे षड्यंत्र असफल सिद्ध हुए , कांग्रेस को अपने इस प्रयास में हर बार हताश ही होना पड़ा
इस संघर्ष में लीग का संगठन मजबूत होता गया अंततः कांग्रेस को लखनऊ में लीग से ऐतिहासिक समझौता करना पड़ा. लीग को अलग राष्ट्र की मांग करने के लिए यही समझौता उपयोगी सिद्ध हुआ और पाकिस्तान का विभाजन उसके अंतर्गत ही हो सका।
उत्तर में घटित हो रहे इन घटनाक्रमों के बाद हमारे यहां के नेतृत्व कर्त्ताओं की भी आंख खुली और अपने लिए स्वतंत्र प्रतिनिधित्व की मांग करना अत्यंत आवश्यक है इसका उन्हें एहसास हुआ। मुस्लिमों को उनकी एकजुटता के कारण अल्पसंख्यक होने के बावजूद हर क्षेत्र में भरपूर हिस्सा मिला, उनके पक्के इरादे और जुझारू वृत्ति के कारण ही वे सफलता हासिल कर सके।
उत्तर भारत में ऐसी परिस्थिति है तो यहां जो जनसंख्या का 90% हैं वे अपने सारे हक अधिकार गवां कर बैठे हैं ,पूरी आबादी सिर्फ 3% संख्या वाले एक विशिष्ट जाति ने सारी जगह हड़प किया हुआ है।
बहुसंख्यकों पर अल्पसंख्यकों द्वारा शोषण उत्पीड़न हकमारी की जा रही है यही शोकांतिका है।
सभी क्षेत्रों में वे पिछड़े हुए हैं।
सर पी त्यागराय ये कांग्रेस के एक प्रबल व्यक्तित्व जो मद्रास में संपन्न हुए कांग्रेस अधिवेशन के सचिव थे।
1916 तक सर पी त्यागराय और चतुर्मुखी प्रतिभा के धनी समाज सेवक डा.टी.एस. नैयर इनकी आपस में कभी पटती ही नहीं थी वे हमेशा आपस में एक दूसरे का विरोध करते रहते थे बाद में उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि उनके झगड़े का फायदा ब्राह्मणों को हो रहा है उनके आपस के झगड़े कैसे और बढ़ें ब्राह्मण सदा इसके लिए प्रयत्नशील रहते थे। इसलिए दोनों ने आपसी झगड़े को खत्म करके संगठित रूप से ब्राह्मणेत्तर आंदोलन की नींव रखी, उनके अंदर खुद को द्रविड़ कहने की हिम्मत नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने ब्राह्मणेत्तर आंदोलन का "साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन" ऐसा नामकरण किया , यही आंदोलन आगे चलकर "जस्टिस पार्टी" के नाम से जाना जाने लगा।
एस आई एल एफ का एजेंडा अत्यंत समझदारी पूर्वक तैयार किए जाने के कारण उसे ब्राह्मणेत्तर जनता का उत्स्फूर्त समर्थन मिला,जिसके कारण उन्होंने 1920 के चुनाव में पहली बार कुछ जगहों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए उसमें उन्हें भरपूर सफलता मिली
उस समय मैं कांग्रेस में था
जस्टिस पार्टी (एस आई एल एफ) का तेजी से फैलाव देखकर कांग्रेस के ब्राह्मणों को जलन होती थी। राजनीति में ब्राह्मणेत्तरों के बढ़ती ताकत को नष्ट करने के लिए ब्राह्मणों ने अनेक प्रयत्न किए।
उसके लिए उन्होंने मि. गांधी से सलाह लिया,
उस समय श्रीमती एनी बेसेंट भी भारतीय राजनीति में अधिक लोकप्रिय थीं उनकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण एक तो वे विदेशी थीं दूसरे ब्राह्मणों के उत्कर्ष के लिए ही अत्यधिक प्रयासरत रहती थीं, ऐसा होने के बावजूद अय्यगांर ब्राह्मण उनसे द्वेष ही करते थे कारण था उनके कार्यों से सर्वाधिक लाभ अय्यर ब्राह्मणों को होता था वह अय्यगांर ब्राह्मणों की उपेक्षा और अय्यर ब्राह्मणों को प्रोत्साहन देती थी, सदाशिव अय्यर,मनी अय्यर,सर सी. पी.रामास्वामी आदि लोगों ने श्रीमती एनी बेसेंट की इच्छानुसार कार्य करने को सदैव तत्पर रहते थे
अय्यगांर ब्राह्मणों को इससे जलन होती थी उन्हें इसका भय सता रहा था कि शैव ब्राह्मण हमसे आगे निकल जायेंगे, सभी क्षेत्रों में उनका ही एकाधिकार हो जायेगा और वैष्णव ब्राह्मण पीछे रह जायेंगे। बाद में उन्होंने श्री सी. राजगोपालाचारी का नया नेतृत्व स्वीकार किया वे अत्यंत प्रतिभाशाली थे ऐसी उनकी ख्याति थी उसके लिए भी उन्होंने गांधी से ही सलाह लिया था। इस प्रकार राजगोपालाचारी ब्राह्मणों के नेता के रूप में स्थापित हुए।
गांधी ने राजाजी (राजगोपालाचारी)को दक्षिण भारत के बड़े नेता के रूप में आगे क्यों लाया किसे पता?
उसी समय मैं कांग्रेस के कार्यों से प्रभावित होकर और राजाजी के आह्वान पर कांग्रेस में शामिल हुआ उस समय अनेक सम्मानित लोग कांग्रेस की तरफ आकर्षित होकर गांधी के अनुयायी बने।
गांधी ने हम सबको सर्वप्रथम हिन्दू मुस्लिम एकता के महत्व को बताया।
दूसरी महत्वपूर्ण बात अस्पृश्यता निर्मूलन के कार्य।
तीसरी गरीबों की उन्नति के लिए खादी योजना।
चौथा दारूबंदी का कार्यक्रम । इस प्रकार के कार्यक्रम गांधी ने चलाए थे।
इसी के साथ उन्होंने यह भी घोषणा की थी कि कांग्रेस किसी चुनाव में भाग नहीं लेगी जिसके कारण मेरी ऐसी समझ बनी कि कांग्रेस एक समाज सुधार आंदोलन है।
उसमें मैंने पूरी तरह समर्पित होकर प्रमाणिक रूप से कार्य किया, कांग्रेस अत्यंत लोकप्रिय बन चुकी थी।
जब जस्टिस पार्टी ने चुनाव जीतकर अपना मंत्रिमंडल बनाया तब कांग्रेस ने विरोधी प्रचार तंत्र की जोरदार मुहिम चलाई ,उसने जस्टिस पार्टी के अच्छे कार्यों का कभी कदर नहीं किया । वे राजनीति के तुच्छ और निकृष्टतम स्तर पर उतर आए, अकारण ही जस्टिस पार्टी पर टूट पड़ते थे, मंत्रियों को दिये जा रहे मानधन पर नहीं चाहिए उतना हो-हल्ला मचाया ,उनकी प्रथम श्रेणी की की जाने वाली रेलयात्रा पर , उनके चश्मे और टोपी पर सभागृह में अनावश्यक चर्चा की जाने लगी,इस निम्न स्तर की राजनीति से वे भोली-भाली जनता का मन जीतने का प्रयास कर रहे थे, हम ही गरीबों के पालनहार हैं कांग्रेस जनमानस में ऐसी छवि बनाने का प्रयास कर रही थी इस तरह के राजनैतिक खेल से जनता को दिग्भ्रमित करने में कांग्रेस कामयाब हुई और 1926 के चुनाव में जस्टिस पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा।
डा. सुब्बारायन के नेतृत्व में कुछ निर्दलीय प्रतिनिधियों के समर्थन से कांग्रेस ने अपनी सरकार बनाई , रंगनाथ मुदलियार और आरोग्य स्वामी मुदलियार भी उस मंत्रिमंडल में शामिल थे किन्तु यह मंत्रिमंडल ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाया।
डा. सुब्बारायन के अतिरिक्त अन्य सभी ने मंत्री पद से इस्तीफा सौंप दिया था।
तत्पश्चात जस्टिस पार्टी के समर्थन से श्री एस मुथिया मुदलियार व सेतूरथीना अय्यर ने सरकार बनाई,इस सरकार ने लोककल्याण के अनेक काम किए, जस्टिस पार्टी जो नहीं कर सकी वे सब काम इस मंत्रिमंडल ने किया।
जाति आधारित आरक्षण का आदेश (Communal G.O.) जारी करने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य इसी मंत्रिमंडल ने किया अनेक जगहों से विरोध की परवाह न करते हुए श्री मुथिया मुदलियार ने यह आदेश पास करके सामाजिक न्याय की नींव डाल दी
परन्तु सभी जातियों को मिलने वाला यह सामाजिक न्याय ब्राह्मणों को सहन न होने के कारण उन्होंने श्री मुथीया के विरुद्ध हमला ही बोल दिया , उन्हें राक्षस के नाम से संबोधित करने लगे , उसके बाद के दो चुनावों में उन्हें मात खानी पड़ी , परन्तु श्री मुथीया इन सबसे जरा भी डगमगाये नहीं ,उनको परिणाम की जानकारी थी इसीलिए हार न मानकर उन्होंने गांव गांव में समाज के उत्थान के लिए अपने कार्यों को निरंतर जारी रखा।
जाति आधारित आरक्षण के शासकीय आदेश के शिल्पकार होने के नाते उसके संरक्षण के लिए खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया।यह आदेश रद्द करने के लिए हुए सारे हमलों का चाहे वे कानूनी हों या अन्य प्रकार के डटकर मुकाबला किया और उसे बचाने का पुरजोर प्रयास किया। जब जब शत्रुओं ने इस आदेश के लिए संकट खड़ा किया तब तब उसे दूर करने के लिए वे डटकर खड़े रहे।
इसीलिए आपको वे अत्यंत चिंताग्रस्त नजर आ रहे हैं, कुछ लोग उनके इस कृत्य पर टिप्पणी करते हुए दिखाई पड़ते हैं, उन्हें इस आदेश के लिए लड़ने का अधिकार नहीं है तो फिर किसे है ? यह टिप्पणी करने वाले बता सकते हैं क्या?
जब इस आदेश को वैधानिक मान्यता दी गई उस समय मैं कांग्रेस में था, मैं कांग्रेस में था फिर भी मुझे इस आरक्षण पर पूरा विश्वास था कांग्रेस नेतृत्वकर्ताओं के बारे में मेरी ऐसी समझ थी कि वे इस आदेश का योग्य क्रियान्वयन करेंगे। तब श्री वी.के. और डा. वरदराजलू नायडू ने कांग्रेस में रहकर भी इस आदेश का विरोध किया था किन्तु मैंने अपनी भूमिका नहीं बदली मुझे इसके लिए श्री राजगोपालाचारी ने भी समर्थन व्यक्त किया था उनका ऐसा मत था कि ब्राह्मणेत्तरों के लिए कुछ जगहें आरक्षित रखी जानी चाहिए अर्थात उनका पूर्ण समर्थन इस आदेश को नहीं था "Communal G.O." यह नाम भी उनको मंजूर नहीं था सिर्फ नाम के लिए मेरे लिखित विरोध का कुछ खास महत्व नहीं था किसी बात से यदि अपना उद्देश्य प्राप्त हो रहा है वही मेरे लिए बहुत था
इसलिए राजाजी की योजना से मैं सहमत था, राजाजी की सहमति से हमने"मद्रास प्रेसीडेंसी एसोसिएशन" की स्थापना , जस्टिस पार्टी के व अन्य ब्राह्मणेत्तर आंदोलन का मुकाबला करने के लिए किया।
हमने जस्टिस पार्टी के विरोध में काम करने की शुरुआत की इस एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर श्री केशव मेनन उपाध्यक्ष पद पर मैं और श्री गोविन्द दास , सचिव पद पर डा.वरदराजलू नायडू की नियुक्ति की गई थी ब्राह्मणेत्तरों के लिए 50% जगह आरक्षित रखना है ऐसा निश्चित किया गया था परन्तु श्री कस्तूरीरंगा अय्यगांर, एस सत्यमूर्ति अय्यर, श्रीनिवास अय्यगांर इत्यादि कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं को यह मंजूर नहीं था।
मेरे दबाव में आकर राजाजी ने मुझे समर्थन दिया था ऐसा आरोप भी उन्होंने राजाजी पर लगाया इतना ही नहीं राजाजी की राजनीति समाप्त करने तक का उन्होंने दुस्साहस किया उन्होंने दूसरे राष्ट्रीय संगठन का निर्माण किया उसमें अध्यक्ष पद पर विजय राघवाचारी, मैं, राजाजी, और व्ही प्रकाशम सचिव,कस्तूरीरंगा अय्यर और व्ही.ओ.सी. इनकी उपाध्यक्ष पद पर नियुक्ति हुई। इस समय यह भी माना गया था कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक जाति को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए तभी राष्ट्र वाद पर बोलने का सबको अधिकार है ब्राह्मणेत्तरों के लिए अस्थायी तौर पर 50% आरक्षण मान्य किया गया था इस राष्ट्रीय संगठन को भरपूर जनसमर्थन मिला था कारण हमने ब्राह्मणेतरों के लिए 50% आरक्षण घोषित किया था परन्तु इसका श्री रंगास्वामी अय्यंगार और श्री एस सत्य मूर्ति को संताप होने लगा और उन्होंने गुप्त रूप से एक कार्यक्रम तैयार किया और उसे कांग्रेस कार्यकारिणी ने मान्य भी कर लिया , अब तुम्हारे ध्यान में आया होगा कि जाति आधारित आरक्षण सैद्धांतिक रूप से कांग्रेस को मान्य था।
1921 में मेरी अध्यक्षता में थिरुवत्रमलाई में कांग्रेस का अधिवेशन संपन्न हुआ,उस अधिवेशन में रंगास्वामी अय्यंगार और श्री निवास अय्यंगार ने अपने अनुयायियों को सर पी थियागराया व जस्टिस पार्टी के अन्य नेताओं के खिलाफ भड़का दिया उन्होंने अत्यंत घिनौना गाली गलौज किया उनके इस असभ्य बर्ताव से मैं भी अत्यंत क्षुब्ध था, मैंने और श्री एस रामनाथन ने उन्हें जैसे को तैसा उत्तर देना तय किया। अध्यक्ष के नाते मैंने एस रामनाथन को बोलने की इजाजत दी, उन्होंने ब्राह्मणों पर जातिवाद करने का आरोप लगा कर तीखा प्रहार किया उसके बाद श्री शैफ मुहम्मद बोलने के लिए खड़े हुए उन्होंने बिना कारण रामनाथन पर आरोपों की झड़ी लगा दी उसके बाद अण्णामलाई व व्यंकटकृष्णा पिल्लै बोलने के लिए खड़े हुए उन्होंने शैफ मुहम्मद को करारा जवाब दिया, मैं यह सब कुछ तुम्हें इसलिए बता रहा हूं कि ब्राह्मण नेताओं से मेरा मतभेद था फिर भी मैं कांग्रेस में कार्यरत था। बाद में 1925 का अधिवेशन कांचिपुरम में श्री वी. का. की अध्यक्षता में संपन्न हुआ अधिवेशन के एक दिन पहले ही कांचीपुरम में मैंने ब्राह्मणेतर कार्यकर्ताओं के साथ बैठक किया, उस बैठक में मुथीया मुदलियार,सर आर.के.षन्मुगम चेट्टी ,वलीनगिरि गौडर, रामलिंगा चेटियार और कुछ अन्य ब्राह्मणेतर कार्यकर्ता उपस्थित थे उस बैठक में हमने Communal G.O. मान्य किया जाय इस तरह का प्रस्ताव तैयार किया,वर्किंग कमेटी के सामने मैंने खुद यह प्रस्ताव रखा परंतु कुछ ब्राह्मण कार्यकर्ताओं ने इस प्रकार के प्रस्ताव को कांग्रेस अनुमति नहीं दे सकती ऐसा कहकर तीव्र विरोध किया।
उसके बाद बाद मैंने अपनी भूमिका बताई और दो टूक शब्दों में कह दिया कि "आप लोगों ने प्रचार के समय जस्टिस पार्टी पर टीका करते हुए कांग्रेस ही ब्राह्मणेतरों की एकमात्र प्रतिनिधि है ऐसा स्पष्ट रूप से घोषित किया है, कांग्रेस ने जाति आधारित आरक्षण का सिद्धांत मान्य किया है आप लोगों को याद दिलाना चाहता हूं कि ब्राह्मणेतरों के लिए 50% आरक्षण निश्चित होने के बाद इस प्रस्ताव को अमान्य करना उचित नहीं है।
मेरे इस विचार पर किसी प्रकार की प्रतिक्रया न देते हुए वह प्रस्ताव सीधे सीधे नामंजूर कर दिया गया।
फिर मैं एक बार इस मुद्दे पर बोलने के लिए खड़ा हुआ और कहा कि कांग्रेस ने अभी विधानसभा में जाना तय किया है ऐसी परिस्थिति में इस प्रस्ताव को मंजूर करना प्रसंगोचित सिद्ध होगा। स्वराज्यिस्ट पार्टी यह कांग्रेस की ही एक शाखा है यह सबको मालूम है जब वह चुनाव लड़ रही है तो उसको समर्थन देना यह कांग्रेस की जिम्मेदारी है इसलिए ब्राह्मणेतरों को 50%आरक्षण देना अत्यंत आवश्यक है आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए ब्राह्मणेतरों को आरक्षण देने का आश्वासन देना यह कांग्रेस की नैतिक जिम्मेदारी है इस चर्चा के बाद अध्यक्ष ने ऐसा कहा कि कल के खुले सत्र में यह प्रस्ताव चर्चा के लिए लिया जायेगा, जिसे मैंने मान्य किया,
परन्तु उसी रात में ब्राह्मण नेताओं ने एक गुप्त बैठक की।उस बैठक में यह तय किया गया कि मुझे प्रस्ताव के समर्थन में कम से कम तीस प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर लाने को कहा जाय क्योंकि मेरे साथ एक भी प्रतिनिधि नहीं था ऐसा उनका मानना था मैंने उनकी यह चुनौती भी स्वीकार की और प्रस्ताव के समर्थन में 50 प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर लाकर दिया फिर भी वह प्रस्ताव निष्ठुरतापूर्वक यह कहते हुए रद्द कर दिया गया कि यह प्रस्ताव कांग्रेस के मूलभूत सिद्धांत के विपरीत है इसलिए हम यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकते।
उनके इस निर्णय से मुझे आश्चर्य का धक्का लगा फिर भी मैं उठकर खड़ा हुआ और बोला कि आप लोगों ने 30 प्रतिनिधियों का समर्थन मांगा था मैंने 50 प्रतिनिधियों का समर्थन प्राप्त किया, आज इस प्रस्ताव पर चर्चा के लिए मुझे कल ही आश्वासन दिया गया था, परन्तु उसके उलट यह प्रस्ताव सीधे सीधे रद्द किया जा रहा है इसका क्या कारण है? मुझे अध्यक्ष से इस पर नि:संदिग्ध निर्णय चाहिए।*मेरे बोलते समय ब्राह्मणों ने बहुत हो हल्ला मचाया उन्होंने कहा कि "अध्यक्ष ने इस प्रस्ताव पर निर्णय दे दिया है और अब दूसरे मुद्दे पर चर्चा हो रही है इसलिए इसमें बदलाव असंभव है तुम नीचे बैठ जाओ।
ब्राह्मणों द्वारा मचाया गया हंगामा निश्चित ही दुराग्रह पूर्ण था उनसे मैंने कहा " यह विषय अध्यक्ष और मेरे बीच में है इस पर चर्चा के लिए आग्रह हो या नहीं ये अध्यक्ष बतायेंगे । मैं बोलूं या नहीं यह अध्यक्ष तय करेंगे यदि उन्होंने मुझे चुप बैठने को कहा तो मैं निश्चित ही आज्ञापालन करूंगा , तुम लोग शांत रहो!
फिर भी ब्राह्मण प्रतिनिधि चीखते चिल्लाते रहे कि नीचे बैठो , नीचे बैठो! उनकी तरफ मुड़कर मैंने फिर कहा कि तुम्हारे चीखने चिल्लाने का कोई मतलब नहीं, हमें भी चिल्लाना आता है हमने यदि चिल्लाना शुरू किया तो तुमसे तेज आवाज हमारी ही होगी, तुम सभी लोग निकलो यहां से। अधिवेशन में हंगामा शुरू हो गया। उसी समय मुझे एहसास हुआ कि अब इसके आगे कांग्रेस में रहना किसी काम का नहीं, मैं अधिवेशन से बाहर निकल आया और मेरे साथ बहुत सारे सहयोगी भी बाहर आ गये।
केवल आरक्षण के मुद्दे पर ही मैंने कांग्रेस छोड़ा।
उसके बाद मेरे पास मेरे मित्र राजाजी और थीरू वी.का. चार पांच बार आये और मुझसे कांग्रेस में वापस आने की विनती किया।
कांग्रेस में अभी भी आरक्षण समर्थक हैं , मेरे 30 से 40 प्रतिनिधि ही बाहर निकले थे और जो कांग्रेस में हैं उनमें आरक्षण के मुद्दे को मजबूती से उठाने या कांग्रेस से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं है इसलिए मुझे कांग्रेस में वापस जाना चाहिए ऐसी उनकी इच्छा थी।
कांग्रेस छोड़ने के बाद मैंने तुरंत स्वाभिमान आंदोलन शुरू किया, राजनीतिक सुधार के साथ ही सामाजिक सुधार का कार्य भी मैंने हाथ में लिया। सबसे पहले समाज में व्याप्त अनिष्ट परंपराओं को बंद करने का मैंने निश्चय किया।
जब मुथीया मुदलियार ने मंत्री बनने के बाद आरक्षण का आदेश जारी किया था मैं अत्यंत आनंदित हुआ था, वह मेरी जीत थी ऐसा मुझे लगता था, मैं कांग्रेस में सादेपन से रहता होता तो मुझे बड़े बड़े पद मिल सकते थे मैंने कांग्रेस क्यों छोड़ा? एकाध पद या सत्ता के लिए छोड़ा था क्या ?
कतई नहीं। आरक्षण का प्रमुख नेतृत्व मैं करूंगा ऐसा विचार भी मैंने नहीं किया था,
इसलिए आज हम सब आरक्षण आदेश के बारे में चिंतित हैं उसे किसी भी परिस्थिति में संकट मुक्त करना है इसलिए हम सब को उसके संरक्षण के लिए आंदोलन खड़ा करना है, केवल उच्च न्यायालय ने आरक्षण का आदेश रद्द किया सिर्फ इसलिए हम सब संघर्ष करने वाले हैं ऐसा नहीं है, कल को यदि सर्वोच्च न्यायालय ने भी ऐसा ही आदेश दिया तो क्या करना है? इसीलिए आरक्षण के आदेश का हर क्षेत्र में क्रियान्वयन कराने के लिए हमें संघर्ष करना है, मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं? क्योंकि इस आरक्षण के आदेश में भी जनसंख्या के आधार पर सभी जातियों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।
इस आदेश के अनुसार 3% ब्राह्मणों को 14% आरक्षण दिया जाता है, 3% क्रिश्चियनों को 7% आरक्षण का प्रावधान किया गया है,ब्राह्मणेतर 87% हैं उनके लिए सिर्फ 72% आरक्षण का प्रावधान है ,इन आंकड़ों पर ध्यान दें तो सभी को जनसंख्या के आधार पर आरक्षण दिया गया है ऐसा लगता है क्या?
3% ब्राह्मणों को 14% आरक्षण किसलिए?
87% ब्राह्मणेतर हैं तो उनके लिए सिर्फ 72% आरक्षण क्यों?
वे घाटा क्यों सहन करें?
इसीलिए हम सबको आंदोलन करना है क्या यह योग्य नहीं है?
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर हमें गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है वह है
नौकरियों में ब्राह्मणों का वर्चस्व , नौकरियों में उनका वर्चस्व बढ़ते ही जा रहा है किसी किसी विभाग में उनकी संख्या 60 से 70% के भी आगे जा रही है।
वरिष्ठ अधिकारियों की जगहें तो उन्होंने 90% के ऊपर हड़प कर रखी हैं।
कुछ दिन पहले "विडूथलाई" अखबार में छप कर आये आंकड़ों का अध्ययन करेंगे तो यह सब स्पष्ट हो जायेगा।
ऐसी हालत में भी मद्रास उच्च न्यायालय ने आरक्षण आदेश को गैरकानूनी होने का निर्णय दिया है, यदि उसने कानूनी होने का निर्णय दिया होता तो भी परिपूर्ण समर्थनीय होता ऐसा तुम्हें लगता है क्या?
इसलिए यह स्पष्ट है कि सभी जातियों को न्याय देने का आदर्श प्रस्थापित होना अभी बाकी है। हम पिछले कितने वर्षों से इसकी मांग कर रहे हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध भी निर्णय दिया और आरक्षण का आदेश पूरी तरह वैध होना घोषित किया फिर भी हमें आंदोलन करना ही पड़ेगा क्योंकि हमारी बहुत पहले से जनसंख्या के आधार पर आरक्षण होना चाहिए यह मांग है।
उसके लिए हम सबको संघर्ष करना ही पड़ेगा , हम सबको बहुत आज्ञाकारी बनकर चलने वाला नहीं है,प्रत्येक को न्याय मिलना ही चाहिए उसके लिए हमें संघर्ष करना पड़ेगा।
और एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखना जरूरी है वह है "आरक्षण का शासकीय आदेश" यह सिर्फ राज्य तक ही सीमित है केंद्र सरकार उसका क्रियान्वयन करे उसके लिए यह बंधनकारक नहीं है,इस आदेश की जरूरत की तरफ केन्द्र शासन अभी भी अनदेखी कर रहा है। इसलिए केंद्र शासन की सभी नौकरियों में ब्राह्मणों का ही वर्चस्व है यह दिखाई पड़ता है उच्च श्रेणी की नौकरियों में उनका ही एकाधिकार है,राज्य शासन की नौकरियों में तो उनका अनुपात तो 70 से 80% है, कर्मचारी भर्ती के समय प्रचंड स्तर पर भ्रष्टाचार करके राज्य से लेकर केन्द्र तक की नौकरियों पर कब्जा करने का प्रयत्न ब्राह्मणों की तरफ से किया जा रहा है,सत्ता उन्हीं की होने के कारण उन्हें आसानी से नौकरियां मिल सकती हैं और उसी प्रकार जगह न होने पर वे जगह का निर्माण भी कर सकते हैं।
अनेक बार ऐसा भी होता है कि एक ब्राह्मण छुट्टी पर जाता है तो अस्थायी तौर पर उस जगह पर ब्राह्मण ही लिया जाता है, उसकी छुट्टी खत्म होने को आई तो दूसरा छुट्टी पर जाता है इस प्रकार अस्थायी जगह को स्थायी बनाने का वे षड्यंत्र रचते हैं।
तब तक उसका वेतन रू 500 के ऊपर चला जाता है।
अपनी जाति को सहयोग करने की ब्राह्मणों की यह एक युक्ति है।
रेलवे विभाग की क्या परिस्थिति है देखिए!
सब कुछ उनके ही हाथ में है।
अंग्रेजों के शासनकाल में तो कुछ हद तक हमें भी कुछ जगहें मिल जाती थी, आज रेलवे में अय्यंगार ब्राह्मणों का ही एकाधिकार है उन्होंने भर्ती कार्यालय का स्थलांतर मद्रास से मुंबई में कर दिया है, चुनाव मंडल के करीब करीब सभी सदस्य ब्राह्मण ही हैं, संपूर्ण परिस्थिति यदि ऐसी रहेगी तो अपने लोगों को नौकरियां कैसे मिलेंगी? केवल चतुर्थ श्रेणी के सिपाहियों की नौकरियों में अपनी संख्या अधिक है, आजकल तो उन जगहों के लिए भी ब्राह्मण स्पर्धा करने लगे हैं, ऐसा कहा जा रहा है कि 65000 सिपाहियों में ब्राह्मणों की संख्या 1300 है,ऐसी परिस्थिति में भी उनके द्वारा आरक्षण के विरोध में कोर्ट में जाना कहां तक समर्थनीय है?
वे ऐसा भी कह रहे हैं कि शैक्षणिक संस्थाओं में उनके प्रवेश को नकारा जा रहा है,
सत्य परिस्थिति क्या है वह देखना पड़ेगा, वे अपने हिस्से में आने वाली जगह से अधिक जगहों पर कब्जा करते हैं इसमें जरा भी शंका नहीं है।
शासकीय आंकड़ों पर नजर डाला तो धक्का ही लगा।
वे महाविद्यालयों की करीब करीब 90% जगहों पर कब्जा किए हुए हैं फिर भी कोर्ट में कहते हैं कि शैक्षणिक संस्थाएं हमारे ऊपर अन्याय कर रही हैं। अन्य जातियों पर वास्तव में अन्याय हो रहा है इसकी उन्हें कभी भी चिंता नहीं होती।
वे इस विषय में गांधी के पास भी गए थे, उन्हें ऐसा लगा था कि गांधी भी उन्हें समर्थन देंगे
परंतु गांधी ने उनसे कहा कि "तुम्हारे में से बहुत बड़ा वर्ग सुशिक्षित हो गया है इसलिए कुछ समय के लिए तुम ईश्वर भक्ति में लीन हो जाओगे तो वह स्तुतीय होगा, जिन ब्राह्मणेतरों को आज तक शिक्षा से वंचित रखा था उन्हें पढ़ने दो।"
गांधी के इस व्यक्तव्य पर यह मंडली नाराज हो गई, मैं यह सब तुम्हें इसलिए बता रहा हूं कि न्याय अपनी ही तरफ है इसकी जानकारी तुम्हें होनी ही चाहिए, जागरूक वर्ग भी इस विषय पर हमें ही समर्थन देगा।
यदि आज हमने आरक्षण आदेश के संदर्भ में आंदोलन नहीं किया तो हमारा भविष्य कैसा होगा ?इसकी कल्पना कीजिए, अपनी भावी पीढ़ी का भविष्य कैसा होगा?
अभी केवल अपना अस्तित्व और स्वाभिमान हम वापस प्राप्त कर रहे हैं,अब से हम मनुष्य के रूप में पहचाने जाने लगे हैं और शिक्षण के लिए पात्र माने जाने लगे हैं।
अपनी आंखें जस्टिस पार्टी के कारण खुली हैं।
उस शासकीय आदेश के कारण केवल अपनी जाति को महाविद्यालयीन शिक्षण के लिए प्रवेश मिलने लगा है जिसके कारण अपने लोगों में से किसी किसी को नौकरियां भी मिल सकी हैं।
जस्टिस पार्टी और उस शासकीय आदेश के पहले हमारी क्या परिस्थिति थी आप लोगों को मालूम ही है आप लोगों को मालूम ही होगा कि जिला न्यायाधीश, तहसीलदार, फौजदार इन पदों पर सब के सब ब्राह्मण ही होते थे।
जस्टिस पार्टी के सत्ता में आने से पहले शत-प्रतिशत ब्राह्मणेतर समाज अशिक्षित ही था, फिर भी जस्टिस पार्टी के 15 वर्ष के शासनकाल और उसी प्रकार कांग्रेस के शासनकाल के प्रयासों के बावजूद ब्राह्मणेतर समाज में शिक्षा का अनुपात 10% के नीचे ही है।
अपने लोग अशिक्षित हैं यह दोष अपना नहीं है,हम शिक्षा के लिए पात्र नहीं हैं यह कोई सिद्ध कर सकता है क्या? सच पूछो तो हमको शिक्षण के लिए योग्य सुविधा व प्रोत्साहन किसी ने दिया ही नहीं यही वस्तुस्थिति है, शूद्र समाज की करीब करीब सभी जातियां सेवा करने वाली ही हैं उन्हें उनके जीने भर को ही रोजगार दिया जाता था, मंहगाई बढ़ने पर ही उनका रोजगार भी थोड़ा बहुत बढ़ा दिया जाता है।
ऐसी परिस्थिति में हाथगाड़ी वाला, सफाईवाला, मजदूर इत्यादि के बच्चे शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं ऐसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
इनकी तुलना ब्राह्मणों के बच्चों से करें तो ऐसा दिखाई पड़ता है कि पुरोहित ब्राह्मण का बच्चा भी डिग्रीधारी हो सकता है और वह न्यायाधीश भी हो सकता है ब्राह्मणों के लिए जाति ही उनकी पूंजी है , उनकी जनेऊ ही उनकी संपूर्ण पहचान है, गरीब ब्राह्मण भी शिक्षित हो सकता है यह हम देख ही रहे हैं।
अपने समाज से सिर्फ अमीरों और जमींदारों के बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, हम सबने इन संपूर्ण अड़चनों को मात देते हुए शिक्षा प्राप्त भी कर लिया फिर भी हमारा कोई भविष्य नहीं है, हमारे लिए नौकरियां नकारी जाती हैं, गुणवत्ता और कार्यक्षमता का नियम हमारे सामने बाधा बनकर खड़ा हो जाता है, अपने बच्चे अच्छे मार्क्स के साथ पास हुए फिर भी उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश नहीं दिया जाता , अपने बच्चे शिक्षा प्राप्त करें ऐसा हमें लगता है यह हमारा गुनाह है क्या?
चुनाव प्रक्रिया में प्रचंड भ्रष्टाचार होता है यह दिखाई पड़ रहा है।
इस वर्ष मैट्रिक परीक्षा में 68000 विद्यार्थी बैठे थे उनमें से 38000 विद्यार्थी फेल हुए हैं ,फेल हुए विद्यार्थी बुद्धिहीन हैं ऐसा कहा जा सकता है क्या ?
मैट्रिक तक की शिक्षा के लिए
कितना प्रचंड खर्च करना पड़ता है ऐसी परिस्थिति में इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को शिक्षा से दूर रखना उचित है क्या ?
मैं तो ऐसा कहूंगा कि जो शिक्षक ऐसे बच्चों को पढ़ाते हैं वही अपात्र हैं। अपनी परीक्षा पद्धति भी कदाचित गलत हो सकती है एक के बाद एक सभी अड़चनों को पार करते हुए अपने बच्चे मैट्रिक पास भी हो गए फिर तुम्हारे मार्क्स कम हैं इस कारण को दिखाकर महाविद्यालयों में प्रवेश देने से इनकार कर दिया जाता है,यह कैसा न्याय है? नौकरी क्यों नहीं देते यह पूछो तो तुम्हारे पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता नहीं है ऐसा उत्तर दिया जाता है हम शिक्षा के लिए भाग-दौड़ करते हैं तो आवश्यक गुणवत्ता प्राप्त नहीं कर सकोगे ऐसा कहकर शिक्षण भी नकार दिया जाता है।
आज बुध्यांक मापने के लिए मार्क को ही आधार माना जाता है ,जो अधिक नंबर लाते हैं सिर्फ वही बुद्धिमान होते हैं ऐसा माना जा सकता है क्या ? अधिक नंबर शायद ही प्रमाणिक रूप से प्राप्त किया जाता है, हमें पता है नंबर कैसे लिए जाते हैं?
परीक्षा खत्म होते ही उत्तर पुस्तिका जांचने के लिए जहां गई होती हैं वहां अनेक लोग पैसे लेकर पहुंच जाते हैं, अपने मंत्रियों को यह सब मालूम नहीं है?
उनमें बहुत सारे इसी तरीके से पास हुए हैं। उनमें जिन्हें खुद को इस तरीके का लाभ नहीं मिला वे अपने बच्चों को इसी तरीके से पास कराने का प्रयत्न जरूर करते हैं, लोगों को मालूम हो चुका है कि मार्क्स पैसे से खरीदे जा सकते हैं।
यह जगजाहिर है कि ब्राह्मणों के बच्चों का हर प्रकार से सहकार्य किया जाता है, ब्राह्मण शिक्षक भी उन्हें सहयोग करते हैं।
परीक्षा खत्म होते ही विनायक के मंदिर में जाना है इतना ही अपने बच्चों को मालूम है।
ब्राह्मणों के बच्चे मंदिर नहीं जायेंगे वे शिक्षक के पास जायेंगे,वे उत्तर पुस्तिका जांचने वाले के पास जायेंगे जो बहुधा उनकी जाति के ही होते हैं। ऐसी परिस्थिति में सिर्फ मिले हुए मार्क्स के आधार पर विद्यार्थियों का बुध्यांक मापना कहां तक उचित है?
रशिया में कुछ निश्चित समयावधि तक बच्चों को शिक्षण दिया जाता है बाद में उनका टेस्ट लेकर प्रशिक्षण और नौकरी दी जाती है, अच्छा काम करना ही वहां परीक्षा समझी जाती है।
यहां परीक्षा ही अत्यंत कठिन ली जाती है , अन्य देशों में ऐसा नहीं है, परीक्षा के नाम पर विद्यार्थियों का अक्षरशः उत्पीड़न किया जाता है।
साथियों ! मुझे ऐसा लगता है कि प्रत्येक जाति को जनसंख्या के आधार पर जगह का वितरण होना चाहिए, एकाध जाति ने यदि 1% भी अधिक जगहों पर कब्जा कर लिया ऐसा सामने आने पर शासन की तरफ से नौकरी देने वाले और नौकरी पाने वाले दोनों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
दूसरों का अधिकारों पर डकैती डालने का यह गुनाह है, इसलिए उसपर कार्रवाई करने में कुछ भी गलत नहीं है। अन्यथा विकसित वर्ग और विकसित होता रहेगा और पिछड़ा हुआ वर्ग और दरिद्र होता चला जायेगा।
स्वतंत्रता के आगमन ने ब्राह्मणों के लिए अधिक अवसर निर्माण करके दिया है। वे तेजी से अपनी तरक्की कर रहे हैं। पहले आई सी एस के लिए होने वाली परीक्षा लंदन में ली जाती थी, इसके लिए वे चतुराई से क्रिश्चियन और मुस्लिम उम्मीदवारों को ब्राह्मणेतर उम्मीदवार के रूप में भेजते थे,सच्चे ब्राह्मणेतरों को जानबूझकर वंचित रखा जाता था क्योंकि वे ब्राह्मणों का विरोध नहीं करते और जाहिर रूप से ब्राह्मणों का आज्ञापालन करते हैं,वे सप्रयास ब्राह्मणेतरों को प्रगति के रास्ते से दूर रखते हैं।
स्वतंत्रता के बाद भी आई पी एस और आई ए एस जैसे महत्वपूर्ण पदों की मक्तेदारी ब्राह्मणों के ही पास है, ब्राह्मण अधिकारियों के हाथ के नीचे काम करने वाले अपने लोगों का भविष्य कैसा होगा?वे झूठे आरोप लगाकर हमारे कर्मचारियों को प्रताड़ित करेंगे, अपने लोग यह कितना दिन सहन करेंगे और नौकरी में टिक पायेंगे?
ब्राह्मणों का हर जगह पर एकाधिकार होने के कारण बहुसंख्यक होने के बावजूद ब्राह्मणेतरों को उससे वंचित रहना पड़ रहा है फिर यह कैसा लोकतंत्र? अपने प्रशासन का यह कैसा आदर्श? यदि आबादी का 87% संख्या वाला समाज दुर्दशा में जीवन गुजारने को विवश है तो यह कैसा लोकतंत्र?
जनसंख्या के 3% वाले लोगों का हर जगह पर एकाधिकार व सत्ता चलाने देना कहां तक तर्कसंगत और योग्य है?
अपने अधिकार की मांग करना गलत है क्या?
हम न्याय मांग रहे हैं
हम स्वाभिमान मांग रहे हैं।
हम अपना हिस्सा मांग रहे हैं।
जब हम अपनी ये मागें मांग रहे हैं तो दूसरों को इससे क्यो तकलीफ होती है?
मेरी जानकारी के अनुसार एक सभा में श्री कामराज ने आरक्षण विषयक शासकीय आदेश पर उनका शासन ध्यान देगा ऐसा आश्वासन जनता को दिया है वे कहते हैं कि उच्च न्यायालय के निर्णय की वे सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करेंगे।
इतना ही बोलकर वे नहीं रुके उन्होंने मुझ पर आरोप लगाया कि इस आंदोलन के पीछे मेरा कुछ निजी स्वार्थ है। वे क्या कहना चाहते हैं मेरे समझ में नहीं आता।
मैंने अपने 30 वर्ष के सार्वजनिक जीवन में अत्यंत नि:स्वार्थी रूप से कार्य किया है।
शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए काम करते हुए मैंने कभी किसी फल की अभिलाषा नहीं रखी। मैंने मेरे लिए कोई एक भी काम किया हो उसका उदाहरण श्री कामराज देंगे क्या ?
उच्च नीचता नष्ट करने के लिए मैं प्रयत्नशील हूं।
सभी मनुष्यों का सामाजिक स्तर व स्वाभिमान स्थापित करने के लिए मैं संघर्ष कर रहा हूं।
सभी को समान न्याय, समान बर्ताव और समान अवसर प्राप्त कराने का मेरा सपना है।
संपूर्ण मानव जाति को स्वाभिमान प्राप्त कराना और उनका सामाजिक स्तर ऊंचा उठाना यह मेरा परम कर्तव्य है।
मैंने आज तक इन सिद्धांतों का अनुपालन व संघर्ष न किया होता तो श्री कामराज तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बन पाये होते क्या ?
बारह मंत्रियों वाले मंत्रिमंडल में ग्यारह मंत्री ब्राह्मणेतर समाज के बने होते क्या ?
हम जब ब्राह्मणेतरों का आंदोलन चला रहे थे तब यह मंडली कहां थी इसका विचार वह करें।
मेरे बारे में बोलने को हुआ तो मैं अध्यक्ष , सेक्रेटरी वगैरह पदों पर विभिन्न मंडलों में काम करता था।
मेरा उत्तम व्यवसाय भी था मेरी कोई खास पहचान न हो ऐसा कभी नहीं था परन्तु अपने इस आंदोलन ने ही इन लोगों को ऊंचे ऊंचे पदों पर बिठाया है ,अब विद्यार्थियों से ये कहते हैं कि वे मेरी बातों पर विशेष ध्यान न दें।
मुझसे उन्हें दूर जाना है तो जाने दो ब्राह्मणों का पैर धोने दो, उसमें मेरा क्या जाने वाला है? मैं तो वृद्ध हूं और मृत्यु के दरवाजे पर खड़ा हूं। अपने बच्चे किसलिए शिक्षा लेते हैं वे स्कूली शिक्षा लेने के बाद महाविद्यालयों में न जाएं क्या? उन्हें अच्छी नौकरियां न मिलें क्या ?
इन सब समस्याओं के निराकरण की जिम्मेदारी वरिष्ठों की नहीं है क्या ?
इसी वर्ष मैंने डा. सुब्रमनीयम को एक पत्र दिया है,फर्स्ट क्लास पास हुए एक विद्यार्थी को प्रवेश देने की मैंने सिफारिश किया है। ऐसे अनेक पत्र पहले भी मैं दे चुका हूं। जगह सुरक्षित रखने का ही सब लोग प्रयत्न कर रहे थे,आज किसी को भी प्रवेश नहीं दिया जाता, भरपूर मार्क्स होते हुए भी आगे की पढ़ाई के लिए अपने बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाता यह सब देखकर अत्यंत दुख होता है। क्या हम पैसे का अपव्यय और गुलाम बनकर रहने के लिए बच्चों को पढ़ायें?
शिक्षण के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, अपने बच्चों को किसी भी फल का लाभ नहीं मिलता यह सब देखकर मन को अत्यधिक संताप होता है , इसीलिए इन सबका उचित उपाय ढूंढ़ना है।
अपना आगे का कार्यक्रम थोड़ा कठिन है, उसके लिए हम सबको अत्यधिक त्याग करना पड़ेगा,हम सब दंगा या मारामारी नहीं करेंगे,हम किसी पर तेजाब नहीं फेंकेंगे, हमें किसी को भी किसी*प्रकार की तकलीफ न देते हुए अनेक अड़चनों और यातनाओं को मात देना है।
इस आंदोलन से हम बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं।
अपनी सरकार दिल्ली में होने की क्या जरूरत है? वह हमारे लिए क्या कर सकेगी?
प्राकृतिक संसाधनों में अपना देश पीछे है क्या ? अपने पास 1500 मील किनारापट्टी है, अपनी जहाजें विश्व में कहीं भी जा सकती हैं, अपने पास रेलवे है ऐसा होते हुए हम तेजी से प्रगति नहीं कर सकते क्या ? फिर अपना हक और सत्ता दिल्ली को किसलिए देना ? वे वहां मंत्री बनकर रहेंगे तो हमारा उत्पीड़न होना निश्चित है। अपने यहां स्वतंत्र शासन हुआ तो भी क्या होगा?
यहां वे अपने मंत्रियों को भी उचित मान सम्मान नहीं देंगे,डा. ए.एल. मुदलियार ने कौंसिल में भाषण करते हुए इस पर खुले मन से अपनी बात रखी है अपने मंत्रियों ने भी अनेक बार यह वास्तविकता मान्य की है कि उत्तर की तरफ से हमेशा दक्षिण भारत की उपेक्षा होती आई है इतना ही नहीं उनका उत्पीड़न भी होता है,हम क्यों दबाए गए हैं? अपने हाथ में यदि सत्ता होती तो सभी समस्याओं का समाधान हम खुद ही किए होते, अनाज की कमी विदेशों से अनाज आयात करके दूर किए होते, आज अपने पास सत्ता नहीं है वे हमें अनाज देते हैं हम किसी तरह मुश्किल से दिन निकाल रहे हैं और वे मजे में हैं, ऐसा कब तक चलने दें?
स्वतंत्रता के लिए हमने अपना पूरा जीवन समर्पित किया है इसलिए अब अपनी भूमि मुक्त करें।
आज का आंदोलन यह केवल उस शासकीय आदेश के लिए ही नहीं छेड़ा गया है बल्कि "द्रविड़नाडु" के विभक्तीकरण के लिए भी हमें संघर्ष करना है।
राजाजी द्वारा हिन्दी लादने के कारण तमिलों की एकजुटता में मदद ही मिली है और तमिल एकता की घोषणा देने पर मजबूर किया है,इस प्रकार आज के अपने इस आंदोलन के माध्यम से सत्तांध आर्यों की विरोधी शक्ति निर्माण करने हेतु हम सबको पूरी तन्मयता से प्रयत्न करना है, अपनी मातृभूमि उत्साह और बड़ी उम्मीद से हम सबको मिल सकेगी, हम सब अपने शासन का निर्माण करें हम अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए स्वतंत्र होंगे।
इसलिए अंत में मैं सभी लोगों से इस आंदोलन में अपनी अपनी भूमिका निभाने का आह्वान करता हूं।
पेरियार रामास्वामी यांची गाजलेली भाषणे (मराठी)
लेखक भीमराव सरवदे,
से साभार- मराठी से हिन्दी अनुवाद ---चन्द्र भान पाल
.jpeg)
टिप्पण्या
टिप्पणी पोस्ट करा